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क्यों कहा जाता है प्रयागराज को तीर्थराज?

प्रयागराज में कुम्भ के मेले का आयोजन हो गया है। कुम्भ के मेले का आयोजन करने के लिए ग्रहो के योगो को देखना होता है उसके बाद कुम्भ के मेले का आयोजन किया जाता है। कहा जाता है जब बृहस्पति के मेष राशि में प्रवेश करने से सूर्य और चंद्र के मकर राशि में होने पर अमावस्या के दिन प्रयागराज में कुम्भ का आयोजन किया जाता है।  प्रयागराज में 15 जनवरी से कुम्भ के मेले का आयोजन हो गया है। इसी के साथ कुम्भ के लिए रामचरित्रमानस में भी इसका वर्णन किया गया है।

रामचरितमानस में कुंभ के बारे में यह वर्णन किया हुआ है

माघ मकरगत रवि जब होई। तीरर्थ पतिहिं आव सब कोई।।

देव दनुज किन्न्र नर श्रेनी। सादर मज्जहिं सकल त्रिवेणी।।

पूजहिं माधव पद जल जाता। परसि अछैवट हरषहिं गाता।।

भरद्वाज आश्रम अति पावन। परम रम्य मुनिवर मन भावन।।

तहां होइ मुनि रिसय समाजा। जाहिं जे मज्जन तीरथ राजा।।

वाल्मीकि रामायण में ऐसा कहा गया है कि माघ के महीने में त्रिवेणी संगम पर स्नान करना  शुभ माना गया है। कुम्भ के मेले में  आकर साधू संत स्नान करते है। और ईश्वर के विभिन्न स्वरूपों की आराधना करते है। कुम्भ में स्नान, दान के साथ ज्ञान का मंथन किया जाता है।इस बात से सब वाकिफ है कि प्रयागराज ही विश्व में एक मात्रा ऐसी जगह है जहा पर तीन नदिया यानी कि गंगा, जमुना और सरस्वती आकर मिलती है।

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इसके आगे केवल गंगा का अस्तित्व शेष रहता है, अन्य नदियों का अस्तित्व समाप्त हो जाता है।इस भूमि पर स्वयं ब्रह्माजी ने यज्ञ आदि काम को संपन्न किया था इसके साथ ही ऋषियों और देवताओं ने त्रिवेणी संगम में स्नान कर अपने को धन्य करते हैं।

इसके साथ ही मत्स्य पुराण में बताया गया है कि युधिष्ठिर ने एक बार मार्केंडय जी से पूछा, ऋषिवर यह बताएं कि प्रयागराज क्यों जाना चाहिए और वहां पर संगम स्नान का क्या फल मिलता है? इस पर मार्केंडय जी कहा प्रयागराज के प्रतिष्ठानपुर से लेकर वासुकी के हृदयोपरिपर्यंत कंबल और अश्वतर दो भाग हैं और बहुमूलक नाग है। यही प्रजापति का क्षेत्र है जो तीनों लोकों में विख्यात है।

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