क्या लड़कियों को अपराध से बचाने के लिए छाती आयरन करने का तरीका सही है?

क्या लड़कियों को अपराध से बचाने के लिए छाती आयरन करने का तरीका सही है?

सूत्रों के मुताबिक आज एक ऐसी बात सामने आई है जिसको पढ़ने से आपकी रूह दर्द से काँप उठेगी। जी हां! बीते दिनों में एक मीडिया रिपोर्ट के जरिये यह बात सामने आई है कि इंग्लैंड में कम से कम हज़ार से अधिक लड़कियों की छाती को गरम पत्थर से  आयरन किया जाता है। आखिर इसकी क्या वजह होगी?

वजह यह है कि उनकी छातियों का विकास धीमा हो। आखिर यह क्रूरता क्यों की जाती है? वजह के रूप में बहुत ही भद्दा जवाब मिला है। यौन शोषण और रेप से  बचाने के लिए लड़कियों के साथ क्रूरता की जाती है।यह परंपरा अफ्रीका से शुरू की गई है। अफ्रीका से लड़कियों की छाती को गरम पत्थर से दागने की परंपरा शुरू हुई है। एक रिपोर्ट के चलते यह सामने आया है कि लंदन, यॉर्कशायर, एस्सेक्स, वेस्ट मिडलैंड्स में रहने वाले अफ्रीकी मूल के परिवारों में ये घटना सामने आई। इस मामले की रिपोर्ट कम्युनिटी वर्कर्स से मिली जानकारी के आधार पर बनाई गई है।

क्या लड़कियों को ही सहना होगा? अपराध बंद नहीं होंगे?

कम्युनिटी वर्कर्स की रिपोर्ट के मुताबिक यह बात सामने  आई है कि लड़की की माँ, चाची या दादी, टीनेज पीरियड शुरू होने से पहले ही लड़कियों के ब्रेस्ट आयरन करती है। इस हिंसा का शिकार दस साल की बच्चिया भी है। यह पता लगा है कि यह ब्रेस्ट आयरनिंग की प्रक्रिया हफ्ते में एक बार तो कभी कभी पंद्रह दिन में एक बार की जाती है।

ज्यादातर यही देखा गया है कि यह अपराध माए ही करती है।  इसके  पीछे उनका मानना है कि वह ऐसा करके अपनी बच्चियों को मर्दों के अटेंशन, यौन हिंसा और रेप से बचा रही हैं। मेडिकल एक्सपर्ट्स की माने तो इसे चाइल्ड एब्यूज मानते है। ब्रेस्ट आयरनिंग के प्रक्रिया से लड़कियों के शारारिक स्वास्थ्य पर तो बुरा असर पड़ता ही है साथ ही में साइकोलॉजिकल मुश्किलें भी होती है।

इससे इन्फेक्शन का खतरा भी बढ़ता है। ब्रेस्टफीडिंग के लिए भी लड़कियां अयोग्य हो सकती हैं और इतना ही नहीं, ब्रेस्ट कैंसर भी हो सकता है। यूनाइटेड नेशन के मुताबिक, ब्रेस्ट आयरनिंग के बारे में काफी कम रिपोर्टिंग की जाती है। लेकिन यह काफी गंभीर अपराध है। इंग्लैंड में पुलिस का कहना है कि ब्रेस्ट आयरनिंग से जुड़े मामलों में उन्होंने चार्जशीट दायर नहीं किए हैं, लेकिन शक है कि ये हो रहा है। कई जानकारों का कहना है कि यह मुद्दा काफी बढ़ रहा है, लेकिन लोगों का ध्यान इस पर नहीं जा रहा। इसको लेकर कोई कानून भी नहीं है।

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